रस किसे कहते हैं? रस के 4 अवयव और 11 प्रकार PDF

नमस्कार दोस्तों, एक बार फिर से स्वागत है आपका the eNotes एक-एक नए आर्टिकल में। इस आर्टिकल में हम रस किसे कहते हैं? रस के प्रकार और उदाहरण PDF पढेंगे।

रस किसे कहते हैं? Ras Kise Kahate Hain

रस का शाब्दिक अर्थ आनंद होता है। काव्य को पढ़ने या सुनने पर जिस आनंद की अनुभूति होती है उसे रस कहते हैं। रस को काव्य की आत्मा कहा जाता है। जिस तरह आत्मा के बिना शरीर कोई अर्थ नहीं होता ठीक उसी प्रकार बिना रस के काव्य भी निरर्थक होता है।

संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्य भरत मुनि ने अपनी कृति ‘नाट्यशास्त्र’ में सर्वप्रथम रस को परिभाषित करते हुए लिखा कि-विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

इसी सूत्र की व्याख्या करते हुए मम्मट ने बताया कि आलम्बन विभाव से उद्बुद्ध, उद्दीपन से उद्दीप्त, व्यभिचारी भाव से परिपुष्ट तथा अनुभाव से लेपित अभिव्यक्ति से जो चेतना उत्पन्न होती है, उसे ‘रस-दशा’ कहते हैं। यह स्थायी भाव होता है।

रस की परिभाषा-Ras Ki Paribhasha- काव्य को पढ़ने या सुनने से जिस आनंद की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं। इसे काव्य की आत्मा भी कहते हैं, यह स्थाई भाव होता है।

रस के अंग। Ras ke ang

रस के 4 (चार) अंग होते हैं, जो निम्नलिखित हैं-

  1. स्थायी भाव
  2. विभाव
  3. अनुभाव
  4. संचारी भाव

स्थाई भाव किसे कहते हैं-

स्थाई भाव का सामान्य अर्थ प्रधान भाव होता है, काव्य में यह भाव शुरू से आख़िर तक होता है। इसे ही रस का आधार माना जाता है। मूलतः रसों की संख्या 9 मानी गई है किंतु बाद में आचार्यों ने इसमें दो भाव (वात्सल्य और भगवद / विषयक रति) मिलने के बाद इसकी संख्या 11 हो गई।

स्थाई भाव रस अर्थ
रति/प्रेम श्रृंगार रस स्त्री-पुरुष का प्रेम
शोक करुण रस प्रिय के वियोग या हानि के कारण शोक भाव
निर्वेद शांत रस संसार के प्रति उदासीन भाव
क्रोध रौद्र रस किसी कार्य की असफलता के कारण उत्पन्न भाव
उत्साह वीर रस दया, दान, वीरता अदि के सम्बन्ध में प्रसन्नता का भाव
हास हास्य रस अंगो या वाणी के विकास से उत्पन्न उल्लास; हंसी
भय भयानक रस भयानक जीव अथवा वस्तु के देखकर मन में उत्पन्न डर
जुगुप्सा / घृणा / ग्लानी वीभत्स रस घिनौने पदार्थ से मन में ग्लानी उत्पन्न होना
विस्मय / आश्चर्य अद्भुत रस आकर्षक वस्तु देखकर मन में उत्पन्न आश्चर्य का भाव
वात्सल्यता / स्नेह वात्सल्य रस माता-पिता का संतान के प्रति प्रेम भाव
भगवद / विषयक भक्ति रस ईश्वर के प्रति मन में उत्पन्न प्रेम भाव
रस किसे कहते हैं
रस किसे कहते हैं

विभाव किसे कहते हैं-

विभाव का शाब्दिक अर्थ ‘कारण’ होता है। भाव उत्पन्न होने के कारण को विभाव कहते हैं, अर्थात जिन वस्तुओं, परिस्थितियों अथवा विषयों के वर्णन से मन में जो सवेदना जागृत होती है, उसे विभाव कहते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं-आलंबन विभाव, उद्दीपन विभाव

आलंबन और उद्दीपन का अर्थ

आलंबन विभाव-

जिसका आलंबन या सहारा लेकर स्थायी भाव जागृत होते हैं, आलंबन विभाव कहलाता है।

उद्दीपन विभाव-

जिन वस्तुओं या परिस्थितियों को देखकर स्थायी भाव उदीप्त होने लगता है, उद्दीपन विभाव कहलाता है।

अनुभाव किसे कहते हैं-

मनोगत भाव को व्यक्त करने वाले शरीर-विकार अनुभाव कहलाते हैं। इनकी संख्या 8 मानी गयी है। स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वर-भंग, कंप, विवर्णता, अश्रु तथा प्रलय

संचारी भाव किसे कहते हैं- संचारी भाव की संख्या कितनी है?

मन में चंचल उत्पन्न करने वाले विकारों को संचारी / व्यभिचारी भाव कहते हैं। संचारी भाव की संख्या 33 मानी गयी है। जो निम्नलिखित है-

हर्ष विषाद त्रास (भय / व्यग्रता)
ग्लानि लज्जा (ब्रीड़ा) चिंता
शंका असूया अमर्ष
मोह गर्व उत्सुकता
उग्रता चपलता दीनता
जड़ता आवेग निर्वेद
धृति मति बिबोध
वितर्क श्रम आलस्य
निद्रा स्वप्न स्मृति
मद उन्माद अवहित्था
अपस्मार व्याधि मरण

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